टिश्यू पेपर 

रोजाना की तरह हस्पताल मरीजों से भरा हुआ था ।मैं लगभग  उठने वाला ही था, सिस्टर ने एक परची रख दी ‘भेजो’

नयी मरीज  अंदर आई।मैं चौंक उठा –‘ अरे तुम ।‘कहने से पहले जुबान थम गई ।मैं  उसे  अब तुम कैसे कह सकता था।पडोस की नंदिता जिसे मैं छुप छुप कर निहारा करता था,  और वह हंसि नी की चाल से निकल जाती ।पर  उसे मालूम था कि दो आंखे  उसका पीछा कर रही हैं ।मौन हमारी बातें  इधर से उधर ले जाता ।हम दोनों मध्यम वर्ग के थे।नंदिता वैश्य परिवार की,  उसके पिता की छोटी सी परचूनी की दुकान थी,और मेरे पिता सरकारी कर्मचारी । एक दिन स्कूल से लौटने पर माँ ने लड्डू खाने को दिए ।लड्डू खाते समय पूछा कि लड्डू किस खुशी में खिलाये जा रहे हैं ।

‘अरे,गुप्ता जी की बिटिया की सगाई की है ।बहुत पैसे वाले घर में हुई है ।बहुत बड़ी साड़ी की दुकान है।लडके की मां को नंदू पसंद  आ गयीं ।नंदू के तो भाग्य खुल गये ।राज करेगी ‘मां अपनी रौ में बोले जा रही थी ।लड्डू बेहद कडवा लगने लगा ।

मैं सड़क निहारता ही रह गया, वह बड़ी सी कार में बैठ कर चली गई ।मैंने अपने को किताबों में डुबो दिया ।आज शहर का माना हुआ ई . एन . टी विशेषज्ञ हूँ ।

‘बैठिए ।क्या परेशानी है ? ‘

उसने धीरे से कहा –‘डॉ  साहब, बांये कान से सुनाई नहीं देता । अभी कुछ दिनों से लगा ।‘

मैंने कान का परीक्षण किया ।परदा फट गया था ।कौन खून की बूंदें भी सूख गयी थी ।सारी कहानी समझ में आ गई ।कान की जांच करने पर पता लगा कि चेहरे पर चोट लगने के कारण हुआ ।जाहिर है घरेलू हिंसा के कारण हुआ ।

मैंने पूछा –‘आपकी समस्या तो चोट लगने के कारण लग् रही है ।क्या हुआ ? 

पुनः  एक मौन  हम दोनों के बीच  आ गया ।

उसने हाथ बढ़ा कर कहा –‘डा. साहब, टिश्यू पेपर है ?’

मैंने दवा लिख दी ।प्रतीक्षा कर रहा था कि कब वह टिश्यू पेपर फेंके,  और मैं उन  आंसुओं को संभाल लूँ ।हमेशा के लिए अपने पास रख लूँ ।

पर  उसने चुपचाप टिश्यू पेपर को भी परचे के साथ अपने पर्स में रख लिया, चुपचाप चली गई ।

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बाहरी हस्तक्षेप

मेरे आसपास जो घटनायें होती हैं,  उन्हीं को शब्दों में डालने का प्रयास करती हूं ।पडोस में शुक्ला दंपत्ति रहते हैं ।शुक्ला जी सरकारी नौकरी  ( आर्डिनेन्स फैक्ट्री )में कार्यरत थे ।सुबह स्कूटर से ड्यूटी जाना और शाम को सब्जी का थैला लटकाए आना।अधिक मिलनसार नहीं थे ।दो बच्चे  और पत्नी माया, छोटा सा परिवार ।बेटी विवाह के बाद ससुराल चली गई ।बेटे का विवाह हो गया ।साल के अंदर बहू ने चांद से बेटे को जन्म दिया ।शुक्ला दंपति निहाल।पर निष्ठुर नियति का प्रहार ।बहू स्वाइन फ्लू से पीड़ित हो गई ।डाक्टरों के अथक प्रयासों के बावजूद भी न बची ।हस्पताल से शव घर लाया गया । अंतिम यात्रा की तैयारी शुरू हो गई ।सारे रिश्तेदार एकत्र हुए,  अचानक बहू के मायके वाले रोते पीटते हुए  आये  और शुक्ला परिवार पर घरेलू हिंसा दहेज का आरोप लगाया ।लाख सफाई दी गई, हस्पताल के बिल दिखाये गये, पर कानून ने पूरे परिवार को हथकड़ी पहना सलाखों के पीछे कर दिया ।मीडिया वाले भी  अपने कैमरे चमकाने में पीछे नहीं रहे ।डेढ़ माह बाद जमानत हो सकी ।शारीरिक  उत्पीड़न से मानसिक  उत्पीड़न बुरी तरह तोड़ देता है ।शुक्ला जी को इतनी मर्मांतक पीड़ा हुई कि उनका मस्तिष्क शून्य हो गया ।सबकुछ भूल गए ।बेटे ने अपने को दोषी मान लिया, ।मुझसे मिला था, बोला “अगले जन्म मोहें  बेटवा  न कीजै “भगवान से प्रार्थना है ।कुछ समय बाद वह  इतना टूट गया था कि जीवन डोर ही टूट गई ।रह गई  उसकी मां, जो बीमार पति  और बेटे की निशानी कृष्णा की देखभाल करती ।पर निष्ठुर नियति को चैन कहाँ । अवसाद में डूबे शुक्ला जी की भी मृत्यु हो गई ।अब  एक असहाय दादी  अपने बारह वर्षीय पौत्र को पाल रही है ।कानून की क्रूरता, बहू चली गई, बेटा चला गया, पति भी चले गए, पर मुकदमा चल रहा है ।किंचित दया नहीं ,यदि दादी भी न रही तो कृष्ण को कौन सहारा देगा ।बहू के माता पिता को क्या हासिल हुआ एक परिवार को बरबाद कर के।बेटी बीमारी के कारण मरी ,इसमें ससुराल पक्ष कैसे दोषी हो गया ।इसमें बच्चे को कितना कष्ट हुआ ।वह तो अनाथ हो गया ।क्या वह कभी सामान्य जिन्दगी जी सकेगा । अपनी दादी के पल्लू से सिमटा कृष्णा क्या अपने ननिहाल वालों को क्षमा कर सकेगा ।

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कछुए की यात्रा 

तीसरी मंजिल पर रहने वाले गप्पी जी धीरे धीरे बाल्कनी की रेलिंग पर चढ़ गए ।जाली को हटाकर रारास्ता बनाया, और ननयी दुनिया देखने के लिए कूद गए ।
चारों ओर शोर मचा, भीड़ ने घेर लिया ।गप्पी जी निश्चल पडे थे।मालिक की बेटी रोते हुए बोली -लगता है कि मर गया ।गप्पी जी ने बड़े कष्ट से गरदन हिला कर संकेत दिया कि अभी प्राण शेष है ।
आनन फानन में उन्हें डाक्टर के पास ले जाया गया, पता चला कि उनके विशेषज्ञ दूसरे हैं ।
फिल्मी डायलॉग “हालत चिंताजनक है, दो दिन तक कुछ कहा नहीं जा सकता ।“
आपरेशन दो घंटे चला ।सी टी स्कैन हुआ ।गले में ट्यूब डाली गई ।फिलहाल आई सी यू में हैं ।
प्रश्न यह उठता है कि ऐसा दुस्साहस उन्होंने क्यों किया ? स्वतंत्रता के लिए या दुनिया की खोज की आकांक्षा ।
वे बोल नहीं सकते, अतः उत्तर हमें ही ढूंढना पडे़गा ।
#chotasakonabadaaasman #hindikavita #hindiarticle

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“यातायात “

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नन्ही चींटी ने जेब्रा क्रासिंग पर कदम बढ़ा या,

मोटा हाथी चलते चलते बीच में  आया ।

चींटी ने उसे समझाया, लाल सिग्नल दिखाया ।

भाई, मेरे लाल बत्ती पर रुको,

पीली बत्ती पर तैयार रहो,

हरी बत्ती पर ही रास्ता पार करो।

जेब्रा क्रासिंग पर चलते पैदल, बूढ़े और स्कूली बच्चे,

उनके लिए ही सिग्नल हुआ लाल,

उन्हें जाने देने के लिए रोको अपनी चाल ।

हाथी बोला सूंड को झटक,  अभी दूंगा तुझे पटक ।

हम तो रास्ता पार करेगें, न रुके हैं, न किसी के लिए रुकेगे।

हाथी ने कदम बढ़ाया, चींटी ने बिगुल बजाया ।

चीटियों की सेना लेफ्ट राइट करती आई, सबने करी हाथी पर चढ़ाई।

कुछ कान में, कुछ नाक में घुस लगी काटने,

हाथी हुआ बैचेन ,लगा रोने चिल्लाने ।

यातायात के नियम  अब कभी नहीं तोड़ा करूगा,

इस बार माफ कर दो अब सारे कानून मानूँ गा ।

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सब्जी मंडी

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चिड़िया रानी गई बाजार,

पर्स में थे रुपए चार।

सब्जी मंडी में चख चख मची थी,

भिन्डी रानी कद्दू, बैंगन से लड़ रही थी ।

आलू ,गाजर, बंद गोभी की परतें खोल रहे थे,

हरी मिर्च के सामने टिन्डा, परवल सी सी कर रहे थे ।

हारकर प्याज बेगम आसूं बहा रही थी,

हरी मटर दिल खोलकर  अपनी तारीफें गा रही थी।

मटर बोली सेम और बीन्स से,

हममें है प्रोटीन, हम शरीर का विकास करती हैं ।

पालक ने हरे पत्ते फैलाये,

मुझमें है,लोहे की शक्ति, सबका खून बढाती है ।

मोटा पीला कद्दू बोला,

मेरा विटामिन ए  आखों की ज्योति बढाती है

लाल गाजर कद्दू से भिडीं,

हममें भी है विटामिन ए,  आखों को चमकाती है ।

फूल गोभी रही खिली खिली,

न मैं मोटा करती,देती विटामिन सी की गोली ।

आलू बोला हमें  उबालकर खाओ,

जी भर पोटेशियम, स्टार्च और विटामिन सी पाओ।

लाल टमाटर बोले, हम सबसे न्यारे,

कच्चा खाओ, पक्का खाओ,सूप बनाओ प्यारे ।

सफेद मूली हंसकर बोली,मुझको खाओ,

अपनी त्वचा, दांत, हड्डियों को चमकाओ।

करेले का दिल कडवा होने लगा,

पास बैठा परवल धीरे से जगा ।

लौकी बहना ने समझाया,

तुम्हीं में है खून साफ करने की कला ।

चिड़िया बोली, मेरे बच्चे सारी सब्जी खाते,

इसलिए है उनमें ताकत, पंख पसारे उड़ते ।

जो बच्चे हरी हरी सब्जियां खाते,

वे स्वस्थ रहकर  आगे बढ़ते जाते।

 

 

 

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मेरा जन्मदिन

मेरे स्वजनों, मित्रों विशेष रूप से आभासी मित्रों का हृदय से आभार ।

मैं बीते दिनों में लौट जाती हूँ, जब 6th फरवरी 1947 को मेरा जन्म हुआ ।भारत नव जीवन के लिए अंगड़ाई ले रहा था।लोगों में स्वतंत्रता के लिए जोश उछालें मार रहा था।भगवान को कोटिश धन्यवाद, कि मैंने केवल छह महीने परतंत्रता में सांस ली।

उस समय हम लोग कानपुर के आरमापुर एस्टेट में रहते थे ।यह बहुत बड़ी कालोनी या कहें उपनगर है ।भांति भांति के लोग यहां रहते हैं, मिली जुली संस्कृति है ।महिलाएं बहुत जल्दी आपस मिल जाती हैं, अतः घरों में हर प्रकार की डिश बनती है ।

पापा जी की बुआ घर संभालने के लिए आई थी ।वे बाहर थाली लेकर खड़ीं थी कि नर्स ने सूचना दी – कन्या हुई है। बुआ थाली पटक कर जोर जोर से रोने लगी । कुछ दिनों पूर्व भाई नहीं रहा, सबको आशा थी कि वह पुनः आयेगा, पर आशा निराशा में बदल गई ।”हाय, मोर मैया, तुलसी उखड़ गई, भांग जम गई “। पहले रोदन भी सुर में होता था । सुनने वाले दुविधा में पड़ जाते कि महिलाएं रो रही है या गा रही हैं।

पापा जी ने अंदर जाकर नवजात शिशु को देखा बड़े खुश हुए।डायरी में लिखा – एक प्यारी बेटी घर आई आशा ।

धीरे धीरे महिलाएं जुटने लगी । उस समय मैडम या मिसेज नहीं पुकारा जाता था, यथा शुक्ला जी पत्नी शुक्लाइन,वर्मा जी की वर्माइन,गुप्ता जी की गुप्ताइन। इन लगा कर बुलाया जाता । सब आई , बुझे मन से बधाई दी, किसी ने लड्डुओं की फरमाइश न की। गुप्ताइन बोली-चलो लड़की ही सही, जी जाये, पहले वाला तो नहीं रहा ।कुछ लोगों को घाव छीलने में सुखद अनुभूति होती है ।

विचार विमर्श के बाद निर्णय लिया गया कि बच्ची को किसी को बेच दिया जाय, इस तरह दोष मुक्ति हो जायेगी ।

मम्मी की परम प्यारी सखी ने एक इकन्नी में खरीदा । पुनः बच्ची को पालने के लिए माता को वापस कर दिया गया । मैं      दो दो माताओं के प्यार के साये में पली ।मैं अपनी मां को मम्मी और उन्हें छोटी मम्मी कहने लगी ।यह रिश्ता जीवन भर रहा।

पापा ने बड़ी धूमधाम से छठी का आयोजन किया । उस समय हलवाई या कैटरर का चलन नहीं था ।घर पडो़स की महिलाएं ही मिल जुल कर छप्पन भोग बनाती । छोटी मम्मी को खस्ता कचौड़ी बनाने में महारत थी,कचौड़ी इतनी खस्ता कि मुंह में जाते ही घुल जाती ।मुन्नी की चाची सामिष मछली बनाने कढाई के सामने बैठ गयी। बंगालिन (चटर्जी )ने बैगन भाजा बनाया, बादमें गरम गरम लूची तली।

बाहर दरियो पर पुरुष विराजमान थे । छोटी मम्मी के पति हारमोनियम बजा रहे थे । उन्हें मैं बाबू कहती थी। हारू मास्टर तबले पर संगत कर रहे थे । बिना माइक के गीत संगीत का दौर चल रहा था । बीच बीच में चुस्कियों का स्वादन और चाची की तली मछलियों चखी जा रही थी । जो मय मय नहीं होना चाहते थे, उनके लिए कुल्हड़ में चाय और पकोड़े थे।

तिवारीइन अपने पुत्र को गोद में उठाये आई। अपनी बुलन्द आवाज में गर्जना की-करे ठाकुर साहब को क्या सूझी, लड़की होने पर जश्न मना रहे । मेरी मां ने सिर झुका लिया और कुछ न बोली। मगर छोटी मम्मी ने ढोलक की थाप पर गाना शुरू कर दिया -आई राधिका लली,बरसाने में आनंद भयो। छोटी मम्मी बहुत अच्छा गाती थी ।फिर तो गीतों का दौर शुरु हो गया ।

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छोटी बच्चियों ने नृत्य कर समा बांध दिया ।काफी देर के बाद भोज प्रारंभ हुआ । पंगत बैठती जाती परसने वाले भाग भागकर पत्तलों में खाना परोसने लगे ।खस्ता कचौड़ी, लूची, दो सब्जियाँ, माछेर कलिया और दही बडा़ आदि ।मनुहार करके खिलाया जाता । बफे सिस्टम नहीं होता था,कि खुद की प्लेट भरो,न पूछने वाला न ही देखने वाला।अंदर आंगन में छोटी मम्मी की देखरेख में महिलाओं का भोज चल रहा था ।मुन्नी की चाची बोली- मछली तलते तलते मेरे हाथ नहीं उठ रहे ।चलो बहन इनको हाथ से खिलाओ।इसी तरह हंसी मजाक के बीच भोज समाप्त हुआ ।

बेटा बेटी में अंतर केवल हमारी मानसिक सोच है। उस जमाने में भी मेरे पापा मम्मी, बाबू ,छोटी मम्मी और परिवार वालों ने जो खुशी मनाई,वह विचारणीय है । इतने वर्षों बाद हमारे प्रधान मंत्री को “बेटी बचाओ” का नारा क्यों देना पड़ा । क्या लोगों की मानसिकता बदल गई है ?

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